Ganesha Strotram

Ganesh Aarti Marathi, English, Hindi

Table of Contents

||सुख करता, दुखहर्ता||

सुख करता, दुखहर्ता, वार्ता विघ्नाचीनूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाचीसर्वांगी सुन्दर उटी शेंदु राचीकंठी झलके माल मुकताफळांची
जय देव, जय देव, जय मंगल मूर्तिदर्शनमात्रे मन कामना पूर्ति जय देव, जय देव ||
रत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमराचंदनाची उटी कुमकुम केशराहीरे जडित मुकुट शोभतो बरारुन्झुनती नूपुरे चरनी घागरिया
जय देव, जय देव, जय मंगल मूर्तिदर्शनमात्रे मन कामना पूर्तिजय देव, जय देव  ||
लम्बोदर पीताम्बर फनिवर वंदनासरल सोंड वक्रतुंडा त्रिनयनादास रामाचा वाट पाहे सदनासंकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवर वंदना
जय देव, जय देव, जय मंगल मूर्तिदर्शनमात्रे मन कामना पूर्तिजय देव, जय देव ||

 

|| श्री गणपति अथर्वशीर्ष ||

श्री गणेशाय नम:’
ॐ भद्रं कर्णेभि शृणुयाम देवा:।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:।।
स्थिरै रंगै स्तुष्टुवां सहस्तनुभि::।
व्यशेम देवहितं यदायु:।1।
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा:।
स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:।
स्वस्ति न स्तार्क्ष्र्यो अरिष्ट नेमि:।।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।2।
ॐ शांति:। शांति:।। शांति:।।।

त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि।।
त्वमेव केवलं कर्त्ताऽसि।
त्वमेव केवलं धर्तासि।।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।।
त्वं साक्षादत्मासि नित्यम्।
ऋतं वच्मि।। सत्यं वच्मि।।
अव त्वं मां।। अव वक्तारं।।
अव श्रोतारं। अवदातारं।।
अव धातारम अवानूचानमवशिष्यं।।
अव पश्चातात्।। अवं पुरस्तात्।।
अवोत्तरातात्।। अव दक्षिणात्तात्।।
अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।
सर्वतो माँ पाहि-पाहि समंतात्।।3।।

त्वं वाङग्मयचस्त्वं चिन्मय।
त्वं वाङग्मयचस्त्वं ब्रह्ममय:।।
त्वं सच्चिदानंदा द्वितियोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि।4।

सर्व जगदि‍दं त्वत्तो जायते।
सर्व जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्व जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।।
सर्व जगदिदं त्वयि प्रत्येति।।
त्वं भूमिरापोनलोऽनिलो नभ:।।
त्वं चत्वारिवाक्पदानी।।5।।

त्वं गुणयत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत: त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधार स्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्ति त्रयात्मक:।।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यम्।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं।
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुव: स्वरोम्।।6।।

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।।
अनुस्वार: परतर:।। अर्धेन्दुलसितं।।
तारेण ऋद्धं।। एतत्तव मनुस्वरूपं।।
गकार: पूर्व रूपं अकारो मध्यरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्य रूपं।। बिन्दुरूत्तर रूपं।।
नाद: संधानं।। संहिता संधि: सैषा गणेश विद्या।।
गणक ऋषि: निचृद्रायत्रीछंद:।। ग‍णपति देवता।।
ॐ गं गणपतये नम:।।7।।

एकदंताय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नोदंती प्रचोद्यात।।
एकदंत चतुर्हस्तं पारामंकुशधारिणम्।।
रदं च वरदं च हस्तै र्विभ्राणं मूषक ध्वजम्।।
रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।।
रक्त गंधाऽनुलिप्तागं रक्तपुष्पै सुपूजितम्।।8।।

भक्तानुकंपिन देवं जगत्कारणम्च्युतम्।।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृतै: पुरुषात्परम।।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनांवर:।। 9।।

नमो व्रातपतये नमो गणपतये।। नम: प्रथमपत्तये।।
नमस्तेऽस्तु लंबोदारायैकदंताय विघ्ननाशिने शिव सुताय।
श्री वरदमूर्तये नमोनम:।।10।।

एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।। स: ब्रह्मभूयाय कल्पते।।
स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते स सर्वत: सुख मेधते।। 11।।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।।
सायं प्रात: प्रयुंजानो पापोद्‍भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।।
धर्मार्थ काममोक्षं च विदंति।।12।।

इदमथर्वशीर्षम शिष्यायन देयम।।
यो यदि मोहाददास्यति स पापीयान भवति।।
सहस्त्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत।।13 ।।

अनेन गणपतिमभिषिं‍चति स वाग्मी भ‍वति।।
चतुर्थत्यां मनश्रन्न जपति स विद्यावान् भवति।।
इत्यर्थर्वण वाक्यं।। ब्रह्माद्यारवरणं विद्यात् न विभेती कदाचनेति।।14।।

यो दूर्वां कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति।।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति।। स: मेधावान भवति।।
यो मोदक सहस्त्रैण यजति।
स वांञ्छित फलम् वाप्नोति।।
य: साज्य समिभ्दर्भयजति, स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।15।।

अष्टो ब्राह्मणानां सम्यग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति।।
सूर्य गृहे महानद्यां प्रतिभासंनिधौ वा जपत्वा सिद्ध मंत्रोन् भवति।।

महाविघ्नात्प्रमुच्यते।। महादोषात्प्रमुच्यते।।

महापापात् प्रमुच्यते।स सर्व विद्भवति स सर्वविद्भवति। य एवं वेद इत्युपनिषद।।16।।

 

|| नानापरिमळ दुर्वा शेंदूर शमिपत्रें ||

नानापरिमळ दुर्वा शेंदूर शमिपत्रें।
लाडू मोद्क अन्ने परिपूरित पात्रें।
ऎसे पूजन केल्या बीजाक्षरमंत्रे।
अष्टहि सिद्धी नवनिधी देसी क्षणमात्रें॥१॥
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती।
तुझे गुण वर्णाया मज कैची स्फ़ूर्ती ॥धृ.॥
तुझे ध्यान निरंतर जे कोणी करिती।
त्यांची सकलही पापे विघ्नेंही हरती।
वाजी वारण शिबिका सेवक सुत युवती।
सर्वहि पावती अंती भवसागर तरती॥ जय देव.॥२॥
शरणांगत सर्वस्वें भजती तव चरणी।
कीर्ती तयांची राहे जोवर शशितरणि।
त्रैलोक्यी ते विजयी अदभूत हे करणी।
गोसावीनंदन रत नामस्मरणी। जय देव जय देव.॥३॥

 

|| उंदरावरि बैसोनि दूडदूडा येसी ||

उंदरावरि बैसोनि दूडदूडा येसी।
हाती मोद्क लाडू घेउनियां खासी।
भक्तांचे संकटी धावूनि पावसी।
दास विनविती तुझियां चरणासी॥१॥
जय देव जय देव जय गणराजा सकळ देवां आधी तूं देव माझा॥ जय देव.॥धृ.॥
भाद्रपदमासी होसी तू भोळा।
आरक्त पुष्पांच्या घालूनिया माळा।
कपाळी लावूनी कस्तुरी टीळा।
तेणे तू दिससी सुंदर सांवळा॥ जय.॥२॥
प्रदोषाचे दिवशी चंद्र श्रापीला।
समयी देवे मोठा आकांत केला।
इंदु येवोनि चरणी लागला।
श्रीराम बहुत श्राप दिधला॥ जय.॥३॥
पार्वतीच्या सुता तू ये गणनाथा।
नेत्र शिणले तुझी वाट पाहतां॥
किती अंत पाहासी बा विघ्नहर्ता।
मला बुद्धी देई तू गणनाथा॥

|| आरती करु तुज मोरया ||

आरती करु तुज मोरया।
मंगळगुणानिधी राजया॥ आरती॥धृ.॥
सिद्धीबुद्धीपती संकटनाशा।
विघ्ननिवारण तूं जगदीशा॥ आरती करुं.॥१॥
धुंडीविनायक तू गजतुंडा।
सिंदूरचर्चित विलसित शुंडा॥ आरती करुं.॥२॥
गोसावीनंदन तन्मय झाला।
देवा देखोनिया तुझ शरण आला॥
आरती करुं तुज मोरया.॥३॥

 

||तू सुखकर्ता तु दु:खहर्ता आरती ||

तूं सुखकर्ता तूं दु:खहर्ता । विघ्नविनाशक मोरया ।
संकटी रक्षी शरण तुला मी । गणपतीबाप्पा मोरया ।। ध्रु ।।
मंगलमूर्ती तूं गणनायक । वक्रतुंड तूं सिद्धिविनायक ।
तुझिया दारी आज पातलों । देई चित्त मज ध्याया ।। १ ।।
तूं सकलांचा भाग्यविधाता । तूं विद्देचा स्वामी दाता ।
ज्ञानदीप उजळुनी आमुचा । निमवी नैराश्याला ।। २ ।।
तूं माता तूं पिता जागीं या । ज्ञाना तूं सर्वस्व जागीं या ।
पामर मी वर उणे भासती । तुझी आरती गाया ।। ३ ।।
मंगलमूर्ती मोरया । गणपतीबाप्पा मोरया ।

 

|| प्रथम तुला वंदितो ||

 प्रथम तुला वंदितो कृपाळा, गजानना, गणराया
विघ्नविनाशक, गुणिजन पालक, दुरित तिमिर हारका
सुखकारक तू, दुःख विदारक, तूच तुझ्यासारखा
वक्रतुंड ब्रम्हांडनायका, विनायका प्रभुराया।।
सिद्धिविनायक तूच अनंता, शिवात्मजा मंगला
सिंदूर वदना, विद्याधिशा, गणाधिपा वत्सला
तुच ईश्वरा साह्य करावे, हा भवसिंधु तराया।।
गजवदना तव रूप मनोहर, शुक्लांबर शिवसुता
चिन्तामणी तू अष्टविनायक, सकलांची देवता
रिद्धि सिद्धीच्या वरा दयाळा, देई कृपेची छाया।।

 

||स्थापित प्रथमारंभी तुज मंगलमूर्ती||

स्थापित प्रथमारंभी तुज मंगलमूर्ती।
विघ्ने वारुनी करिसी दीनेच्छा पुरती।
ब्रह्मा विष्णु महेश तीघे स्तुती करिती।
सुरवर मुनिवर गाती तुझिया गुणकीर्ती॥१॥
जय देव जय देव जय गणराजा।
आरती ओवाळू तुजला महाराजा॥धृ.॥
एकदंता स्वामी हे वक्रतुंडा।
सर्वाआधी तुझा फ़डकतसे झेंडा।
लप लप लप लप लप लप हालति गज शुंडा।
गप गप मोद्क भक्षिसी घेऊनि करि उंडा॥जय.॥२॥
शेंदूर अंगी चर्चित शोभत वेदभुजा।
कर्णी कुंडल झळ्के दिनमनी उदय तुझा।
परशांकुश करि तळपे मूषक वाहन दुजा।
नाभिकमलावरती खेळत फ़णिराजा॥३॥
भाळी केशरिगंधावर कस्तुरी टीळा।
हीरेजडित कंठी मुक्ताफ़ळ माळा॥
माणिकदास शरण तुज पार्वतिबाळा।
प्रेमे आरती ओवाळिन वेळोवेळा॥जय.॥४॥

 

|| वेदशास्त्रांमाजी तूं मंगलमूर्ती ||

वेदशास्त्रांमाजी तूं मंगलमूर्ती।
अगणित महिमा तुझा कल्याण स्फ़ूर्ती॥
भक्तांलागी देसी विद्या अभिमत ती।
मोरेश्वर नाम तुझे प्रसिद्ध या जगती॥१॥
जय देव जय देव जय मोरेश्वरा।
तुझा न कळे पार शेषा फ़णिवरा॥धृ.॥
पुळ्यापश्ये नांदे महागणपती।
माघ चतुर्थीला जनयात्रे येती।
जें जें इच्छिति तें तें सर्वही पावती।
गणराजा मज बाळा द्यावी अभिमती॥जय.॥२॥
एकवीस दुर्वांकुरा नित्ये नेमेसी।
आणूनि जे अर्पिती गणराजयासी॥
त्याचे तू भवबंधन देवा चुकविसी।
विठ्ठलसुत हा ध्यातो तुझिया चरणासी॥३॥

 

|| जय देव जय देव जय वक्रतुंडा ||

जय देव जय देव जय वक्रतुंडा।
सिंदुरमंडीत विशाळ सरळ भुजदंडा॥ जय ॥धृ.॥
प्रसन्न भाळा विमला करिं घेवूनि कमळा।
उंदिरवाहन दोंदिल नाचसि बहुलील।
रुणझुण करिती घागरिया घोळा।
सतार सुस्वर गायन शोभित अवलीला॥जय॥१॥
सारीगपमधनीसप्तस्वर भेदा।
धिमकिट धिमकिट मृदंग वाजती गतिछंदा॥
तातग थैया करिसी आनंदा।
ब्रह्मादिक अवलोकिती तव पदारविंदा॥जय.॥२॥
अभयवरदा सुखदा राजिवरलनयना।
परशांकुशलड्डूधर शोभित शुभवदना।
उर्ध्वदोंदिल उंदिर कार्तिकेश्वर रचना।
मुक्तेश्वर चरणांबूजिं अलिपरि करि भ्रमणा।
जय देव जय देव जय.॥३॥

|| आदि – अवतार तुझा अकळकळपठारी ||

आदि अवतार तुझा, अकळकळपठारी।
ब्रह्मकमंडलु गंगा रहिवास तये तीरी।
स्नान पै केलिया हो, पाप ताप निवारी।
मोरया दर्शनें हो, जन्ममरण दूरी॥१॥
जय देवा मोरेश्वरा जय मंगळमूर्ती॥
आरती चरणकमळा, ओवाळू प्राणज्योती॥जय.॥धॄ.॥
सुंदरमस्तकी हो, मुकुट पिसे साजीरा।
विशाळ कर्णद्वय, कुंडले मनोहर।
त्रिपुंडटिळा भाळी, अक्षता ते सोज्वळी।
प्रसन्न मुखकमळ, मस्तकी दुर्वांकुर॥जय.॥२॥
नयन निर्मळ हो भुवया अति सुरेख।
एकदंत शोभताहे, जडित स्वर्ण माणिक।
बरवी सोंड सरळ, दिसतसे अलौकिक।
तांबूल मुखीं शोभे अधररंग सुरेख॥जय॥३॥
चतुर्भुजी मंडित हो, शोभती आयुधें करी।
परशुकमलअंकुश हो, मोद्क पात्र भरी।
अमृतसम मधुर, सोंड शोभे तयावरी।
मूषक वाहन तुझें, लाडू भक्षण करी॥जय.॥४॥
नवरत्नहार कंठी, यज्ञोपवीत सोज्वळ।
ताईत मिरवीतसे, त्याचा ढाळ निर्मळ।
जाईजुई नागचांफ़े, पुष्पहार परिमळ।
चंदनी कस्तुरीचा शोभे टिळक वर्तुळ॥जय.॥५॥

|| एकदंता गुणवंता गौरी सुखसदना ||

एकदंता गुणवंता गौरी सुखसदना।
ऋद्धीसिद्धीदायक कलिकिल्मिषदहना॥
उन्नत गड स्त्रवती डुलती नग नाना।
शुंडादंडेमंडित गंभीर गजवदना॥१॥
जय देव जय देव जय शंकरकुमरा।
पंचप्राणे आरती उजळूं तुज चतुरा॥ जय॥धृ.॥
अंबुजनेत्री बुब्बुलभ्रमर भ्रमताती।
भारेंसुरवर पुजा देवा तुझि करिती।
लाडूधर वरदका मुनिजन गुण गाता।
कर्णी कुंडले देखुनि रविशशि लपताती॥जय.॥२॥
चरणी नुपुरांची रुणझुणध्वनी उठली।
एकविस स्वर्गी भेदुन तदुपि संचरली॥
अनंत अंडे ज्यांच्या घोषे दुमदुमली।
अदभुत पंचभुतें तेथुनि उद्भवली॥जय.॥३॥
ऎसे वैभव तुझे नाटक नृत्याचें।देखुनियां लुब्धलें मन गंधर्वाचे॥
ऎकुनि चिंतन करणे तुझिया चरणाचें।
चिंतन करितां नासे दु:ख विश्वाचें॥जय.॥४॥
कमलासन भयनाशन गिरिजानंदना।
कटि सुंदर पीतांबर फ़णिवरभूषणा॥
विद्यावर पदिं तोडर अमरारीमथना।
मनरंजन रहिमंडण गणपति गुरु जाणा॥
जय देव जय देव जय शंकर.॥५॥

 

||अनादिनायक चिंतामणीदेवा||

अनादिनायक चिंतामणीदेवा।
विद्याधर तुज म्हणती करिती सुर सेवा॥
नकळे ब्रह्मादिकां पार्वतिसुत ठेवा।
भावे पाहावा निज मानसिं घ्यावा॥१॥
जय देव जय देव गणपती स्वामी।
पंचप्राणी आरती करितो तुजला मी॥जय.॥धृ.॥
परशू अंकुश कमळां धरिलें अवलीळा।
सिंदूरचर्चित भाळा।
शोभसि रिपु काळा॥
गंडकपालालंकृति पुष्पांच्या माळा।
रुणझुण चरणी होती नुपुर अवळीला॥जय.॥२॥
श्वेत छत्र चामरी तुजला मिरवीती।
उंदीराचे वाहन तुजला गणपती॥
खाज्यांचे लाडू शोभती हाती।
मूर्ती अवलोकितां न ढळती पाती॥जय.॥३॥
राजस उंदीर ठमकत ठमकत चाले।
हालत हालत दोंदिल डोलत मग चाले॥
ध्याने ध्यातां गातां सर्वहि जन धाले।
हरिगुणमंडित वाणी जन पंडीत बोले॥
जय देव जय देव.॥४॥

|| याळा गणपति स्वामी द्यावी मज भेटी ||

याळा गणपति स्वामी द्यावी मज भेटी
दीनदयाळा गणपति स्वामी द्यावी मज भेटी।
तव चरणांची सखया मजला आवडी मोठी॥धृ.॥
कवण अपराध म्हणवुनि देवा केला रुसवा।
अहर्निशी मी हृदयी तुझा करितसे धांवा॥दीन.॥१॥
चिंताकूपी पडलों कोण काढील बाहेरी।
धांवें पावें सखया करुणा करुनि उद्धरी॥दीन.॥२॥
ऐसे होते चित्ती तरि का प्रथमचि देवा।
अंगीकार करुनि केला कृपेचा ठेवा॥दीन.॥३॥
आतां करणें त्याग तरिही स्वामी अघटित।
शरण आलों माझा आता चुकवी अनर्थ॥दीन.॥४॥
यादवसुत हा विनवी दोन्ही जोडूनियां कर॥
तव चरणाचा सखया मजला आहे आधार॥दीन.॥५॥

||प्रेमगंगाजळे देवा न्हाणियेलें तुजला||

प्रेमगंगाजळे देवा न्हाणियेलें तुजला।
सुगंध द्रव्ये मर्दन करुनी हेतू पुरविला॥
गंगाजळे रौप्याची त्यांत कि भरिलें जळाला।
सुवर्णाचा कलश आणुनी हाती तो दिधला॥
अंग मर्दितां ह्स्तें मजला उल्हासचि झाला।
स्नान घालूनि वंदियेलें मी तुझीया चरणाला॥
चरण क्षाळुनि प्राशियेले मी त्याही तीर्थाला।
वाटे सात पिढयांचा मजला उद्धारचि झाला॥
अंग स्वच्छ करुनि तुजला पीतांबर दिधला।
अति सन्मानें सिंहासनि म्यां तुजला स्थापियला॥
भक्ता सदाशिवतनय सदा लागत तव चरणी।
सर्वस्वहि त्यागुनि झाला निश्चय तव भजनी॥

गणपतीची आरती – बारों में आरती गणपतचरना
बारों में आरती गणपतचरना।
बरगजवदना गिरिजानंदना॥ बारो.॥धृ.॥
कोमल पदपंकज सुकुमार।
झ्यंझन नुपुर कर घनघोर ॥ बारो.॥१॥
पीतांबर कटी नाभि सुब्याळ।
लंबोधर गरे मोहन माल॥॥ बारो.॥२.॥
रतनमुकुट सिस चंद सुमनिये।
श्रवणच्युवत मद कुंडल सोहे॥ ॥ बारो.॥३.॥
अनुपम रुप तेरो कांहालो बखानू।
मंगिशसुत शरणागता ज्यानू॥ बारो मे॥४.॥

 

|| आरती गणपती पदपंकजि प्रीती ||

आरती गणपती। पदपंकजि प्रीती॥
ओवाळूं भावें भक्ती। सर्वारंभी मंगळमूर्ती॥धृ.॥
आधारे सृष्टी ज्याचें। तो हरिगौरीसुत नाम ज्याचे। होय विघ्नांचा अंत॥१॥
पाहतां रुप ज्याचें। अद् भूतचि गजमूख॥
शशांकसूर्य वन्ही॥ त्रिनेत्र दंत एक॥२॥
पन्नग विभूषणें। कटिकटि मंडीत॥
श्रवणी कंठ गळा। वेष्टितसे उपवित॥३॥
सायुध कर चारी। लंब उदर ज्याचे॥
भरले चौदाविधी। चौसष्टिकळी साचें॥४॥
सिद्धीऋद्धीबुद्धीचा भुक्तिमुक्तींचा दाता॥
बिरुदाचे तोंडर। पायी गर्जतीरमतां॥५॥
षडानन बंधूसंगे। नाचसि डमरु नादें॥
शिवशक्ती पाहोनियां ध्यान मनी। प्रेमभावे पुजीत॥
श्रीदास तुजलागी। करी तयासि मुक्त॥८॥

 

|| गजवदना मन नमले पाहुनियां तुजला || 

गजवदना मन नमले पाहुनियां तुजला।
म्हणतां मंगलमूर्ती संताप हरला॥
यास्तव निश्चय चरणी भाव तो धरिला।
व्यापुनि अवघे विश्व म्हणती तुज उरला॥१॥
जय देव जय देव जय संकटहर्ता।
तुजविण नाही कोणी संसारी त्राता॥धृ.॥
गिरिजांकी बैसुनियां स्तनपान करिसी।
तो तू राक्षस मोठमोठे निर्दळासी॥
उचलुनि शुंडाग्राने त्रैलोक्य धरिसी।
गिरीजारागें नित्य कां रें थरथरसी॥ जय.॥२॥
दास विनायक मूर्ती पाहुनिया डोले।
मंगलमूर्ती हृदयी राहो हें बाले॥
प्राणी जे गुण गाती ते जाणा तरले।
आपण तरुनी अपुले पूर्वज उद्धरिले॥जयदेव जयदेव ॥३॥

 

|| जय जय विघ्नविनाशन जय इश्वर वरदा ||

जय जय विघ्नविनाशन जय इश्वर वरदा।
सुरपति ब्रह्म परात्पर सच्चिंद्धन सुखदा॥
हरिहरविधिरुपातें धरुनिया स्वमुदा।
जगदुद्भवस्थितीप्रलया करिसी तूं शुभदा॥१॥
जय देव जय देव जय गणपति स्वामी, श्रीगणपती स्वामी, श्रीगणपती स्वामी।
एकारति निजभावें, पंचारति सदभावे करितो बालक मी॥धृ.॥
यदादिक भूतात्मक देवात्मक तूचि।
दैत्यात्मक लोकात्मविक सचराचर तूंची॥
सकलहि जिवेश्वरादि गजवदना तूंची।
तवविण न दिसे कांही मति हे ममसाची॥जय.॥२॥
अगणित सुखसागर हे चिन्मया गणराया।
बुद् धुदवत् जैअ तव पदि विवर्त हे माया॥
मृषाचि दिसतो भुजंग रज्जूवर वायां।
रजतमभ्रम शुक्तीवर व्यर्थचि गुरुराया॥ जय.॥३॥
अन्न प्राण मनोमय मतिमय हृषिकेषा।
सुखमय पंचम ऐसा सकलहि जडकोशां॥
साक्षी सच्चित् सुख तू अससि जगदीशा।
साक्षी शब्दही गाळुनि वससि अविनाशा॥जय.॥४॥
मृगजलवेत हे माया सर्वहि नसतांची।
सर्वहि साक्षी म्हणणे नसेचि मग तूचि।
उपाधिविरहित केवळ निर्गुणस्थिती साची।
तव पद वंदित मौनी दास अभेदेची॥जय देव.॥५॥

|| आवडी गंगाजळें देवा न्हाणीलें ||

आवडी गंगाजळें देवा न्हाणीलें॥
भक्तीचें भूषण प्रेमसुगंधे अर्पीले॥
अहं हा धूप जाळू गणपतीपुढे॥
माझ्या मोरयापुढें॥
जंव जंव धूप जळे तवं तवं देवा आवडे॥१॥
पंचप्राणहीत धूपदीप जो केला॥
नैवेद्याकारणे उत्तम प्रकार अर्पिला॥
मध्वनाथस्वामी पंचोपचारि पूजीला॥
मग एकार्तीसी प्रेमे प्रारंभ केला॥२॥

|| त्रिपुरासुर वधु जातां शिव तुजला चिती ||

त्रिपुरासुर वधु जातां शिव तुजला चिती।
बळिबंधन कराया वामन करि विनंती॥
धाता सृष्टि सृजितां न चले मंदमती।
स्मरण करितां तुझे मग झाली स्फ़ूर्ती॥१॥
जय देव जय देव जयजी गणराया।
हरिहरब्रह्मादिक ते वंदिती तव पाया॥धृ.॥
धरणी धरित मस्तक शेषाला ओझें।
जाहालें तेव्हां स्मरण करि पै तुझे॥
हळुवट पुष्पप्राय घेले गणराजें॥
सुकीर्तीमहिमा घोषे भुवनप्रय गाजे॥ जय.॥२॥
महिषासुरासि वधिता पार्वतिही समरी।
विजया देही म्हणुनी प्रार्थी गौरी॥
गाती मुनिजन योगी सिद्धादिक सौरी।
तुझिया वरदे जिंकिती मन्मथ नरनारी॥जय॥३॥
पंडीत रामात्मज हा कवि किंकर तुझा।
विनवी तुजला भावें पावें निजकाजा॥
ऋद्धीसिद्धीदाता तो स्वामी माझा।
संकट हरुनि रक्षी भक्तांची लज्जा॥जय.॥४॥

|| जय जय गणपती ओवाळीत आरती ||

जय जय गणपती। ओवाळीत आरती।
साजि-या सरळ भुजा। परश कमळ शोभती॥धृ.॥
अवतार नाम भेद। गणा आदी अगाध॥
जयासी पार नाही। पुढे खुंटला वाद॥
एकचि दंत शोभे। मुख विक्राळ दोंद॥
ब्रह्मांडा माजि दावी।ऐसे अनंत छंद॥ जय.॥१॥
हे महा ठेंगणी हो। तुज नृत्यनायका॥
भोंवरी फ़ेरे देता। असुरा मर्दीले एका॥
घातले तोडर हो। भक्त जनपाळका॥जय॥२॥
सुंदर शोभला हो। रुपे लोपली तेजें।
उपमा काय देऊं। नसे आणिक दुजे॥
रवि शशि तारांगणे। जयामाजी सहजे॥
उधरी सामावली। जया ब्रह्मांडबीजे॥जय.॥३॥
वर्णिता शेष लीला। मूखे भागली त्याची॥
पांगुळले वेद कैसे। चारी राहिले मुके॥
अवतार जन्मला हो। लिंग नामिया मुखे॥
अमूर्त मूर्तिमंत। होय भक्तीच्या सूखे॥ जय॥४॥
ऐसाचि भाव देई। तया नाचतां पुढे॥
धूप दीप पंचारती। ओवाळीन निवाडे॥
राखें तूं शरणांगता।तुका खेळतां लाडे॥ जय॥५॥

 

|| श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र! ||

मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं
कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम् ।
अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं
नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम् ॥१॥

नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरं
नमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम् ।
सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं
महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥२॥

समस्तलोकशंकरं निरस्तदैत्यकुञ्जरं
दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम् ।
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं
मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥३॥

अकिंचनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्तिभाजनं
पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम् ।
प्रपञ्चनाशभीषणं धनंजयादिभूषणम्
कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम् ॥४॥

नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजं
अचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम् ।
हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां
तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम् ॥५॥

महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं
प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।
अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां
समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात् ॥६॥

|| घालीन लोटांगण ||

घालीन लोटांगण, वंदीन चरण ।डोळ्यांनी पाहीन रुप तुझें ।

प्रेमें आलिंगन, आनंदे पूजिन । भावें ओवाळीन म्हणे नामा ।।१।।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बंधुक्ष्च सखा त्वमेव ।

त्वमेव विध्या द्रविणं त्वमेव । त्वमेव सर्वं मम देवदेव।।२।।

कायेन वाचा मनसेंद्रीयेव्रा, बुद्धयात्मना वा प्रकृतिस्वभावात ।

करोमि यध्य्त सकलं परस्मे, नारायणायेति समर्पयामि ।।३।।

अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम।

श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं, जानकीनायकं रामचंद्र भजे ।।४।।

हरे राम हर राम, राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।

 

 

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